Thursday, April 23, 2009
जुगाड़
आज फिर होने लगा है जुगाड़ नयी सरकार बनाने को,
खरीद फरोख्त की राजनीती में न जाने कितने बिके और कितने बिकने को हैं,
इलेक्शन से पहले वादों का दौर चलता है,
कोई कहता है हमने ये किया,
कोई कहता है हम ये करेंगे,
पर क्या कोई निभा पाता है अपने किये वादों को,
हम सब जानते हैं नहीं बिल्कुल नहीं,
फिर भी आम जनता बेबस है,
उसने तो अपना फ़र्ज़ निभा दिया और,
अब विबश है तमाशा देखने को,
इसी आश में की शायद यह सरकार अपने किये वादों को पूरा करेगी,
पर क्या ऐसी सरकार पूरा कर सकती है अपने किये वादों को,
जो खुद ही जुगाड़ की राजनीती से बनी है,
"नहीं" और यही सच्चाई है,
फिर भी हम बेबस थे.... हैं.... और,
अगर ऐसा ही रहा तो शायद हमेशा बेबस ही रहेंगे !
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